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10 दिनों में मात्र चालीस हजार पिंड.मात्र पांच दिन शेष

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गयाजी का पितृपक्ष मेले का 10 दिन पूरा हो चुका है। अब मात्र पांच दिन शेष रह गए हैं। इन 10 दिनों के बीच यात्रियों की संख्या में काफी कमी देखी गई। नतीजा मेले का असर जहां पिंडदान के कर्मकांड पर पड़ा है। वहीं गया का बाजार भी पूरा प्रभावित हो गया है। इसके पीछे यूपी के बाढ़ और सुखाड़ के अतिरिक्त महंगाई की बोझ एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
पितृपक्ष मेले में सर्वाधिक भीड़ उत्तर प्रदेश की होती रही है। शुरूआत के दो दिनों तक तो मेले में भीड़ दिखी लेकिन देखते-देखते यह क्रम काफी कम होता गया। विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष कन्हैया लाल मिश्र बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से सिर्फ प्रधानपुर क्षेत्र के लोग नजर आए। वहां कई स्थानों पर बाढ़ आ गया तो कई क्षेत्र सूखा प्रभावित हो गए। वैसे में श्रद्धालु कम आए। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश से आने वाले यात्रियों की भीड़ यहां दो दिन बाद भी देखी जाती थी। लेकिन वहां से जो सूचना मिल रही है उसके मुताबिक अब कम लोग ही आएंगे।
मध्य प्रदेश का भी यही हाल रहा। अब एक उम्मीद बंगाल की ओर है। जहां से एक से दो दिनों में यात्री आ सकते हैं। श्री मिश्र ने बताया कि महंगाई के कारण भी लोग पूजा-पाठ थोड़ा कम ध्यान देते हैं। इसका भी असर हमलोग महसूस कर रहे हैं।
इतना ही नहीं, पितृपक्ष मेला के पूर्व यात्रियों के आगमन की संभावना को लेकर कई गयापाल पंडा द्वारा प्राइवेट तौर आवास किराए पर लिया जाता है। इस तरह के कई मकान अभी भी खाली पड़े हैं। उनका मानना है कि जब जम्मू कश्मीर मे आई प्रकृति विपदा के कारण ही कई लोग इस क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाए। जो भीड़ थी वह सिर्फ एक दो दिन ही दिखी। भले ही एक अनुमान के मुताबिक आठ दिनों में तीन से चार लाख यात्रियों गया आगमन की बात सामने आई है। गयापाल तीर्थ पुरोहित सही-सही आकलन पिंडदान के क्रम में पिंडों की गणना के बाद करते हैं। यह गणना प्रतिदिन होती है।
विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक बताते है कि बाढ़ और सूखाड़ के अतिक्ति महंगाई के कारण यात्रियों में काफी कमी आई। 10 दिनों में मात्र चालीस हजार पिंड हुए। यह संख्या बताती है कि मेला में आने वाले यात्रियों का प्रतिशत काफी कम रहा।
मंदिर के बगल में होटल व्यवसाय कर रहे ललन गुर्दा भी कहते हैं कि रात के बेला में जो दुकानें रात 12 बजे तक खुल रहती थी वह 10 बजे तक बंद हो जाती है। सड़कों पर सन्नाटा हो जाता है।

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