Comments Off on बुवाई उपरांत गेहूं फसल की देखभाल 58

बुवाई उपरांत गेहूं फसल की देखभाल

कृषि / पर्यावरण, ताज़ा ख़बर, ताज़ा समाचार

फसल की खेत की तैयारी से लेकर मंडी में बेचने तक का पूरा लेखा-जोखा अपने पास रखना चाहिए। इससे हर बार बाहरी सलाह की आवश्यकता नहीं होगी तथा नफा-नुकसान का आकलन भी आसानी से किया जा सकता है।
– बुवाई के तुरंत बाद गेहूं की प्रजाति के अनुसार उर्वरक एवं सिंचाई का खाका बना लें कि कब व कितने दिन बाद प्रयोग करना है। हालांकि फसल की स्थिति के अनुसार इसे आगे-पीछे किया जा सकता है।
– बुवाई के बाद नियम बना लें कि दिन में कम से कम एक बार सभी खेतों के चारों तरफ तथा हफ्ते में एक दिन फसल के बीच से होकर घूमना है, फसल के हालचाल जानने हैं।
सिंचाई-फसल बुवाई के बाद सर्वप्रथम सिंचाई का ध्यान रखें। सीमित सिंचाई वाली प्रजाति में 2-3 सिंचाई (उपलब्धता अनुसार) यदि 2 ही सिंचाई हेतु जल उपलब्ध हो तो प्रथम 35 से 40 दिन तथा दूसरी 70 से 80 दिन पर करें। तीन सिंचाई हेतु जल उपलब्ध होने पर प्रथम 20-22 दिन, द्वितीय 50-55 दिन तथा तीसरी 80-85 दिन पर करें। यदि पूर्ण सिंचित प्रजाति बोई है तो 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। याद रखें जब बाली सुनहरे रंग में तब्दील हो तो सिंचाई बंद कर दें, नहीं तो दाने की चमक खत्म हो सकती है। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि जब खेत में मिट्टी की गहराई कम हो, अथवा कंकरीली हो तो कम गहरी तथा जल्दी-जल्दी सिंचाई की आवश्यकता होती है। यहां उपरोक्त क्रम को बदलना पड़ सकता है।
पोषण – क्योंकि गेहूं की फसल को नत्रजन की अधिक आवश्यकता होती है, अत: सीमित सिंचाई वाली फसल में प्रथम सिंचाई के वक्त 100 किलोग्राम यूरिया/हैक्टेयर की दर से छिटककर देना चाहिए/जबकि पूर्ण सिंचित फसलों में इतने ही यूरिया की मात्रा प्रथम तथा द्वितीय सिंचाई के समय देना आवश्यक है। यदि उपरोक्त दी गई यूरिया की मात्रा के बाद भी फसल पीली पड़ रही है तथा उचित (सामान्य) वृद्धि नहीं हो रही है तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। यह कीट, विषाणु या रोग के कारण भी हो सकता है, अथवा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने के कारण भी ऐसा हो सकता है। यदि खेत में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी आ जाती है तो उसी तत्व की बाजार में उपलब्ध व्यापारिक साधन जो सस्ते होते हैं, से पूर्ति करना चाहिए। उदाहरणार्थ, जिंक की कमी होने पर 0.25 प्रतिशत बिना बुझे चूने के साथ 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट से, बोरोन- 0.5 प्रतिशत बोरेक्स से, लोहा- 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट से, मैगनीज- 0.5 प्रतिशत मैगनीज सल्फेट से, मोलिब्डेनम- 0.25 प्रतिशत अमोनियम मोलिब्डेट से तथा कॉपर 0.25 प्रतिशत कॉपर सल्फेट से एक या दो बार छिड़काव करके पूर्ति करना आवश्यक होता है। इनके प्रयोग से फसल की पैदावार में जो बढ़ोतरी होती है, उसकी तुलना में लागत काफी कम आती है।
खरपतवार – गेहूं की फसल के लिए प्रथम 35 दिन खरपतवारों (नींदा) के लिहाज से काफी क्रांतिक होते हैं। यानी, इस समय तक खेत को नींदाविहीन रखना अति आवश्यक है। इनको हैंड हो, खुरपी आदि से निकाला जा सकता है। यदि श्रमिक उपलब्ध नहीं हों तो फसल बुवाई के 25 से 35 दिन के बीच खरपतवारों के प्रकार जैसे चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए 0.5 से 0.75 किग्रा मैटसल्फ्यूरॉन मिथाईल 6 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से, संकरी पत्ती वाले खरपतवार (जंगली जई, गेहूं का मामा आदि) के लिए 60 ग्राम क्लोडीनोफास या सल्फोसल्फ्यूरॉन 25 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर तथा दोनों प्रकार के खरपतवार होने पर वेस्टा अथवा एटलान्टिस 400 ग्राम/प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। याद रखें, खरपतवारनाशियों के छिड़काव हेतु फ्लेट फेन नोडल का इस्तेमाल करें तथा खरपतवार के 2-4 पत्ती होने पर छिड़काव अधिक प्रभावी रहता है।
पाले से बचाव –अन्य फसलों की तरह ही गेहूं को भी पाले द्वारा काफी हानि पहुंचने का डर रहता है। मध्य क्षेत्र में पाला दिसंबर के अंतिम सप्ताह या जनवरी के प्रथम सप्ताह में पडऩे की संभावना रहती है। याद रखें, इस अवधि में फसल में पानी की कमी न हो तथा संभव हो तो पाले की संभावना लगने पर सिंचाई कर देनी चाहिए। प्रबल संभावना होने पर खेत में धुआं काफी मददगार रहता है। यदि 0.1 प्रतिशत व्यापारिक सल्फ्यूरिक अम्ल (1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव दिसंबर के अंतिम सप्ताह में जब पाला पडऩे की संभावना हो, द्वारा फसल को बचाया जा सकता है।
चूहों से बचाएं –गेहूं की फसल को चूहों द्वारा काफी हानि पहुंचाई जाती है। इनका प्रकोप बुवाई के तुरंत बाद से शुरू होकर खलिहान तक चलता रहता है। क्योंकि इनका आवागमन एक खेत से दूसरे खेत में होता रहता है। अत: इनके नियंत्रण हेतु अकेले के बजाय सामूहिक प्रयास अधिक बेहतर रहते हैं। इनके नियंत्रण के लिए पहले दिन यदि संभव हो तो सभी गड्ढे बंद कर दें ताकि दूसरे दिन पता चल सके कि किस गड्ढे में चूहे हैं। इसके बाद 2-4 दिन तक ज्वार के फूले अथवा आटे की गोलियां (जो आटे में थोड़ा मूंगफली का तेल व पानी मिलाकर बनाई गई हों) को बिना जहर के डालें। फिर अंतिम दिन इन गोलियों में जिंक फास्फाइड चूर्ण मिला दें। चूर्ण की मात्रा प्रति गड्ढा 5-7 ग्राम रखी जा सकती है। अगले दिन सभी मरे हुए चूहों को एकत्रित करके कूड़े के साथ जला दें अथवा किसी गड्ढे में दबा दें।
कीटों से बचाव – गेहूं की फसल में कभी-कभी कीट का प्रकोप भी देखा जाता है। इन कीटों में तना मक्खी (सूट फ्लाई), तना छेदक (स्टेम बोरर) मकड़ी, मोयला तथा दीमक का प्रकोप होता है। दीमक का प्रकोप होने पर एक-एक कर पौधे सूखने लगते हैं तथा खींचने पर पौधा आराम से खिंच आता है। इसके लिए क्लोरोपाइरीफॉस 20 ईसी की प्रति लीटर अथवा इमिडाक्लोरोप्रिड 17.8 ईसी की 60 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर मात्रा को 80 से 100 किलोग्राम मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर खेत में बिखेर दें तथा तुरंत पानी लगा दें। तना मक्खी का प्रकोप पौधे निकलने के कुछ समय बाद ही शुरू हो जाता है। इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड का 40 ग्राम सक्रिय तत्व का छिड़काव कर देना चाहिए। स्टेम बोरर (तना छेदक) के लिए क्विनालफॉस 25 ईसी का 250 ग्राम सक्रिय तत्व का छिड़काव फायदेमंद रहता है। यदि खेत में मकड़ी या मोयले का प्रकोप हो तो क्विनालफास का 200 ग्राम या ट्राइजोफॉस 40 ईसी का 400 ग्राम या क्लोरोपाइरीफॉस का 200 ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड का 20 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें।
रोग से बचाव – यदि पुरानी प्रजाति की बुवाई की गई है तो फसल में कुछ बीमारियों के आने की संभावना रहती है। इनमें इस क्षेत्र में मुख्य बीमारियां जो कि गेहूं की फसल में आती हैं, जैसे भूरा (पत्ती) तथा काला (तना) रोली, जिसे रस्ट के नाम से जानते हैं। अनावृत कंडुआ जिसमें बाली में दाने की जगह काला चूर्ण भरा होता है, तथा करनाल बंट जिसमें दाने का कुछ हिस्सा या पूरा दाना काला पड़ जाता है।
इन बीमारियों के नियंत्रण हेतु अवरोधी किस्में तथा बीजोपचार ही प्रमुख रहता है। फिर भी बुवाई के उपरांत ये बीमारियां फसल में दिखती हैं तो भूरा या काला रोली का प्रकोप होने पर फसल में 2-3 छिड़काव 0.1 प्रतिशत प्रोपिकोनेजोल (टिल्ट) 25 ईसी या टेबुकोनेजोल 250 ईसी का करने से लाभ होता है। अनावृत कंडुआ ग्रसित बाली दिखते ही उन्हें तुरंत पॉलीथिन से ढंक कर सावधानी से खेत के बाहर ले जाकर जला दें अथवा गहरे गड्ढे में गाड़ दें तथा उपरोक्त कवकनाशियों का इस्तेमाल करें।

Back to Top

Search