Comments Off on कला, कृषि व योग के क्षेत्र में इन लोगों ने बढ़ाया बिहार का मान-सम्मान 24

कला, कृषि व योग के क्षेत्र में इन लोगों ने बढ़ाया बिहार का मान-सम्मान

कृषि / पर्यावरण, ताज़ा ख़बर, ताज़ा समाचार, बिहार

आज ही के दिन 22 मार्च 1905 को बिहार बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग होकर एक नया राज्य बना था. इन 105 वर्षों में बिहार का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. बिहार के लोगों ने आज हर क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़़ी है. आज हम आपको बिहार की माटी से जुड़े उन लोगों की कहानी बता रहे हैं जिन्होंने अपनी मेहनत के बल पर बिहार को विशेष पहचान दिलाया है.
कृषि क्षेत्र में दिलीप सिंह ने बनायी विशेष पहचान
कृषि क्षेत्र में पहले की अपेक्षा अब बदलाव दिखने लगा है. घाटे का कार्य होने के बाद भी बिहार में कुछ ऐसे भी किसान हैं, जो जैविक खेती का नये प्रयोग कर मिट्टी से सोना उपजा रहे हैं. साथ ही अभावों के बीच सफलता की नयी ऊंचाइयों को छू रहे हैं. ऐसे ही सफल किसानों में से एक हैं रोहतास जिले के सासाराम प्रखंड के महद्दीगंज निवासी किसान दिलीप सिंह. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि कड़ी मेहनत व लगन से खेती की जाये, तो निश्चित ही किसान अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर कर सकता है. वे 60 एकड़ जमीन पर खुद सब्जी की खेती की बदौलत सालाना लगभग चालीस लाख रुपये कमा रहे हैं. साथ ही हजारों किसानों को प्रेरित भी किया.
इस सराहनीय कार्य के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं. दिलीप सिंह का कहना है कि एक एकड़ बैगन की खेती से आठ से 10 माह तक फल प्राप्त करते हैं. सवा लाख तक लाभ होता है. बैगन का बीज स्वयं तैयार करते हैं. देशी बैगन का 100 ग्राम बीज तैयार करने के लिए आठ से 10 बैगन की की जरूरत होती है.
सम्मान व पुरस्कार : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, दिल्ली के वैज्ञानिकों का सहयोग एवं भारतीय सब्जी अनुसंधान, अदलपुरा (वाराणसी) में 2008 में डीन डॉ आरपी सिंह द्वारा एक किसान के रूप में विशेष जानकारी होने के लिए रजत पदक प्रदान किया गया. काशी हिंदू विश्वविद्यालय सह कृषि प्रदर्शनी में बैगन (लंबा) के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए पहला स्थान प्राप्त किया. अगस्त, 2010 में पटना में आयोजित ‘सब्जी की ऑर्गेनिक खेती व प्रमाणीकरण’ कार्यशाला में भाग लेकर प्रमाणपत्न प्राप्त किया. 2005 में भारतीय सब्जी अनुसंधान, वाराणसी द्वारा आयोजित सब्जी उगानेवाले महोत्सव में भी उन्हें पुरस्कार मिला. इंटरनेशनल फूड प्रोसेसिंग का पुरस्कार-2010 में मिला.
2011 में अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय इनोवेटिव किसान नाबार्ड ने भी राज्यस्तरीय किसान पुरस्कार-2011, जगजीवन अभिनव किसान पुरस्कार-2012 में दिया गया. 2012 में ही बिहार कृषि विश्वविद्यालय से इनोवेटिव कृषक अवार्ड मिला. इसके अलावा अच्छी खेती के लिए देश व विदेश स्तर पर भी कई पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं.
भीमराज राय ने कृषि व मछली पालन में बनायी अलग पहचान
खेती अब घाटे का व्यवसाय नहीं रही़ इसमें नये प्रयोग की पूरी संभावना है़ इन संभावनाओं की बदौलत कई किसानों ने मिसाल कायम की है़ उन्होंने ज्यादा उत्पादन प्राप्त किया और दूसरे किसानों के प्रेरक बऩे ऐसे ही किसानों में हैं भोजपुर जिले के पीरो प्रखंड के देवचंदा गांव के भीमराज राय 55 वर्षीय भीमराज राय धरती से सोना उपजाने में लगे हैं अपनी बीस एकड़ जमीन में धान, गेहूं, मक्का एवं दलहन, तिलहन की खेती के साथ बागवानी, पशुपालन और मछली पालन भी करते हैं. भीमराज राय एक एकड़ जमीन में तालाब बना कर मछली पालन कर रहे हैं. उनके मुताबिक 22 एकड़ में धान व गेंहू की खेती कर 12-13 लाख रुपये की आमदनी हो जाती है़ मछली पालन से दो लाख की आमदनी होती है़ मिश्रित खेती कर साल में 15 लाख रुपये कमा लेते है़.
सम्मान व पुरस्कार : खेती के प्रति इनके समर्पण और उपलब्धियों को ध्यान में रख कर वर्ष 2007 में राज्य सरकार ने किसान भूषण से सम्मानित किया़ साथ ही किसानश्री का भी पुस्कार मिला़ इसके अलावा राष्ट्रपति के आमंत्रण पर राष्ट्रपति भवन में कृषि चर्चा करने का अवसर भी इन्हें मिला़ इनकी खेती में हो सहयोगी स्थायी रूप से इनके साथ कार्य करते हैं.
मिथिला पेंटिंग को बउवा देवी ने दिलायी विशेष पहचान
बिहार में मधुबनी जिले के जितवारपुर निवासी स्व. जगन्नाथ झा की 75 वर्षीय पत्नी बउवा देवी को मधुबनी पेंटिंग में विशेष याेगदान के लिए पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किया गया है. बउवा देवी मिथिला पेंटिंग की अत्यंत ही सूक्ष्म कलाकार हैं. उनको इससे पूर्व 1986 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. जिसे उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकट रमन के हाथों प्राप्त हुआ. उन्होंने जापान में भी जाकर पेंटिंग की प्रदर्शनी में हिस्सा ली थी. जहां जापान सरकार द्वारा पुरस्कृत भी किया गया था. इसके अलावा अन्य कई पुरस्कार वे प्राप्त कर चुकी है.
बउवा देवी मधुबनी पेंटिंग की उन प्रारंभिक कलाकारों में हैं जिन्होंने मधुबनी पेंटिंग की परंपरागत शैली दीवाल लेखन को कागज पर उतार कर दुनिया के सामने उजागर किया. उनकी नागकन्या श्रृंखला की 11 पेंटिग्स पूरी दुनियां में चर्चित रही है. अधिकांश पेंटिंग्स में इन्होंने लोक कथाओं को जीवंत किया है. आधुनिकीकरण के बावजूद अभी भी बउवा देवी अपनी पेंटिंग में प्राकृतिक रंगों को ही तरजीह देती हैं. वे मात्र पाचवीं कक्षा तक पढ़ी हैं.
योग के लिए समर्पित स्वामी निरंजानंद सरस्वती
बिहार में मुंगेर के निवासी बिहार योग भारती के प्रमुख स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया है. स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने अपना जीवन योग और केवल मुंगेर एवं बिहार नहीं बल्कि कई अन्य देशों में लोगों के स्वस्थ जीवनयापन के लिए समर्पित कर दिया है. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 14 फरवरी 1960 को जन्मे स्वामी निरंजनानंद की जीवनदिशा उनके गुरु स्वामी सत्यानंद द्वारा निर्देशित रही. उन्हें गुरु ने योग निद्रा के माध्यम से योग और अध्यात्म का प्रशिक्षण दिया. कम उम्र में ही वे इतने योग्य हो चुके थे कि स्वामी सत्यानंद ने उन्हें दशनामी संन्यास परंपरा में दीक्षित करने के बाद काम पर लगा दिया.
निरंजनानंद ने अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक योग का प्रचार किया. उन्होंने विशेष तौर पर ध्यान और प्राणायाम के क्षेत्र में अनुसंधान का काम अल्फा रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉ. जे कामिया के साथ काम किया. सेन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया के ग्लैडमैन मेमोरियल सेंटर के जापानी डॉ. टॉड मिकुरिया ने उन पर ध्यान संबधी शोध किए.
भारत लौटने के बाद उन्होंने बिहार योग विद्यालय को विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा तक ले गए. वर्ष 1993 के विश्वयोग सम्मेलन के बाद गंगा दर्शन में बाल योग मित्र मंडल की स्थापना की गयी. इसका आरंभ मुंगेर के सात छोटे बच्चों से किया गया और आज मुंगेर शहर में ही बाल योग मित्र मंडल 5000 से अधिक प्रशिक्षित बच्चे योग शिक्षक हैं. स्वामी निरंजनानंद ने 1994 में विश्व के प्रथम योग विश्वविद्यालय, बिहार योग भारती की तथा 2000 में योग पब्लिकेशन ट्रस्ट की स्थापना की. स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने योग, तंत्र, उपनिषद पर अनेक प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं.

Back to Top

Search