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अरहर की उत्पादन पद्धति

कृषि / पर्यावरण

एस.पी.आई.पद्धति को अन्य नाम जैसे धारवाड़ पद्धति, रोपण विधि, या अरहर सघनता पद्धति आदि नामों से जाना जाता है इस विधि का विकास कृषि वैज्ञानिकों द्वारा कर्नाटक में स्थित कृषि विश्वविद्यालय, धारवाड़ में किया गया।
खेत का चुनाव
अरहर के लिए बलुई दोमट भूमि अच्छी होती है उचित जल निकास तथा हल्के ढालू खेत अरहर के लिए सर्वोतम होते है।
बीज की मात्रा
प्रति हेक्टेयर 2-3 किलो ग्राम बीज की आवश्यकता होती है जबकि पारंपरिक पद्धति से बुवाई हेतु 10-12 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है।
पॉलीथिन बेग में नर्सरी तैयार करना
नर्सरी के लिये 25 लम्बाई बाली अपेक्षाकृत मजबूत छिद्रयुक्त पालीथिन इस्तेमाल होता है।
प्रत्येक थैली में छनी हुये स्वस्थ उपजाऊ मिट्टी तथा कम्पोस्ट खाद 60:40 के अनुपात में मिलाकर भरना होता है। मिश्रण में सिंगल सुपर फास्फेट और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश भी मिला देते है।
प्रत्येक थैली में उक्त अनुसार मिश्रण भरकर हल्की सिंचाई कर लें। तथा उगने बाली खरपतवार का उन्मूलन करने के पश्चात् फफूंदनाशक द्रव्य तथा पी.एस.बी., राइजोबियम, कल्चर से उपचारित अरहर बीज ट्राइकोडर्मा विरडी द्वारा 5 प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। इसके बाद राइजोबियम फेसियोलाई व पी.एस.बी. कल्चर द्वारा 5 प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लें। अरहर का एक-एक दाना प्रत्येक थैली में लगाना होता है। तथा इन थैलियों को अर्धधूप-अर्धछांव वाले स्थान (पेड़ के नीचे) रखें तथा प्रत्येक दूसरे दिन झरे की सहायता से हल्की सिचाई शाम के समय की जावें। तथा आवश्यक पौध संरक्षण उपायों का प्रयोग किया जावें।
एसपीआई पद्धति से अरहर उत्पादन के मुख्य सिद्धान्त
अरहर की फसल अवधि (खेत में 180 दिन से घटकर 125 -140 दिन ) में परिपक्वता जल्दी आ जाती है।
दूरी अधिक होने से वायु का आवागमन अच्छा होगा, जिससे पौधे स्वस्थ, मजबूत होंगे शाखायें अधिक संख्या में लगेंगी एवं प्रति फली दानों की संख्या अधिक होगी, जबकि देशी विधि (कम दूरी) से ऐसा संभव नहीं है।
बीज दर काफी कम एवं उत्पादन कई गुना ज्यादा प्राप्त होता है।
पोषक तत्व एवं उर्वरकों की कम मात्र में जरुरत होती है।
अरहर की इस विधि में अंतरवर्तीय फसलों को आसानी से लिया जाता है।
फसल में शस्य क्रियायें करने में आसानी होती है।
अधिक वर्षा व अल्प वर्षा में सफल फसल उत्पादन संभव होता है।
अरहर एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है अरहर उत्पादन में मध्य प्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर आता है अरहर एक विलक्षण गुण सम्पन्न खरीफ फसल है इसका उपयोग अन्य दलहनी फसलों की तुलना में दाल के रूप में सर्वाधिक किया जाता है एवं इसमें मास की तुलना में प्रोटीन भी अधिक (21.26 प्रतिशत) पाई जाती है।
मानव आहार में दलहनों (अरहर) का प्रमुख स्थान है लेकिन भारत में इनका उत्पादन आवश्यकता के अनुरूप नहीं है यदि प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ानी है तो दलहन का उत्पादन बढ़ाना होगा इसके लिए उन्नतशील प्रजातियों और उनकी उन्नतशील कृषि विधियों में धारवाड़ पद्धति से खेती करना लाभदायक साबित होगा।
खेत में रोपण करने की विधि
चयनित क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन जुताई कर लेनी चाहिए ताकि अरहर की जड़ों के विस्तार हेतु सुविधाजनक हो स्तिथियाँ प्राप्त हो सके। वर्षा प्रारंभ होने पर जब खेत में पर्याप्त नमी आ जाये तथा ढ़ेले फूट चुके हों तब (क़तार से क़तार 1.50 मीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 0.90 मीटर) अरहर के पौधे ऊँची उठी हुई मेंढ़ में ट्रांसप्लांट करनी चाहिए। रेज्ड बेड पर बुवाई करने से अधिक वर्षा होने पर इन नालियों से अतिरिक्त पानी बहार निकल जाता है। तथा कम वर्षा में इन भेड़ों में पर्याप्त नमी बनी रहती है।
ट्रांसप्लांट करने से पूर्व अरहर के पौधे और उसकी शाखाओं की फुनगियों की खुदाई अवश्य कर लेनी चाहिए खुदाई के पश्चात 1 से 2 दिन की विश्राम देने के पश्चात ही खेत में पालीथिन पृथक कर पौध रोपण करना चाहिए। यदि ट्रांसप्लांट पौधों में से कोई पौधे मृत हो जाते है तो उनके स्थान पर पुन: पौधे रोपित करना चाहिए।
पोषक तत्व एवं उर्वरक
खेत की मिट्टी परीक्षण परिणाम के अनुसार तत्वों के कमी की पूर्ति हेतु जैविक खादों और रसायनिक खादों का उपयोग किया सकता है। एस.पी.आई. विधि में सम्पूर्ण खेत में पोषक तत्व उपयोग नहीं किया जाता है बल्कि पौधवार पोषक तत्व उपयोग किये जाते है रोपाई के बाद पौधवार पोषक तत्व थालों में प्रति पौधे के हिसाब से दिया जाता है जब प्रति हेक्टेयर 7400 पौधे हों तो प्रति पौधे पोषक तत्व की मात्रा
नत्रजन – ग्राम 8.5/पौधा
स्फुर ग्राम17 /पौधा
पोटाश -ग्राम 4.2/पौधा
जिंक – ग्राम 1/पौधा
फूल आने से पूर्व घुलनशील उर्वरक ए.पी.के (18:18:18) का छिड़काव) 4 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से और 400 लीटर घोल करने पर अधिक शाखाएं, फूल और फलियाँ प्राप्त होती है।
शाखाएं तोड़ना (खुटाई)
शीर्ष कलिका विच्छेदन – नयी शाखयों की फुगगियों की खुटाई करके अरहर की ऊंचाई नियंत्रित की जा सकती है अन्यथा इस प्रकार रोपित अरहर 3 मीटर तक ऊंचाई की हो सकती है
फसल की देखभाल
खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए कतारों के मध्य में अल्प अवधि की अन्य फसल लेना उचित होगा जैसे – उड़द, अदरक या पन्त लोबिया -3 या रासायनिक उपचार में इमेजाथायपर 750 उस लगभग 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
कीट प्रबंधन हेतु प्रारंभ में जैविक विधि एवं उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से किया जाना चाहिए। खड़ी फसल में गौमूत्र व छाछ विधि से तैयार घोल का छिड़काव 15 दिन के अन्तराल से अधिक लाभकारी होता है। अवश्यकता पडऩे पर रसायनिक दवाइयों का उपयोग किया जाये।
अरहर शुष्कता की स्थिति को सहन करती है परन्तु जल प्लावन से क्षति ग्रस्त होती है इस कारण रेज्ड बेड (ऊँची उठी हुई क्यारियों/मेड़ों) में रोपण करना चाहिए।
किस्में – एसपीआई पद्धति की अरहर में सभी लोकप्रिय किस्में प्रयुक्त की जा सकती है बेेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए 150-180 दिन फसल अवधि की किस्में उपयुक्त होगी।
किस्म स्त्रोत पकने की अवधि (दिन) उपज (क्विं/हे.) विशेषताएं
उपास -120
125-150Nov-15 शीघ्र पकने बाली
जवाहर अरहर – 4
180-20016-18 उकटा सहनशील
जवाहर (जेकेएम 189)
116-12421
टी.जे.टी.-501
खरगोन 136-183 18उकटा सहनशील
(आशा)-87119
160-180 16.18 एस एम् डी एवं विल्ट प्रतिरोधी –
401, जवाहर (-7), मालवीय विकल्प (-3) एवं खरगोन-2 आदि उन्नत किस्में मध्य प्रदेश हेतु अनुसंशित की गई है

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